Shivratri Special : 2018

महाशिवरात्रि का पर्व परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का मंगल सूचक पर्व है. उनके निराकार से साकार रूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि कहलाती है. सदाशिव हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर आदि विकारों से मुक्त करके परम सुख, शांति और ऐश्वर्य प्रदान करते हैं. शिवरात्रि व्रत पूजा हर महीने की कृष्ण पक्ष में चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है. जिसे मास शिवरात्रि कहते हैं . इस वर्ष यह शिवरात्रि 13 फरवरी 2018 को मनाई जाएगी !

महाशिवरात्रि के दिन शिवभक्त उपवास रखते हैं। इस दिन भगवान शिव के भक्त मंदिरों में जाकर शिवलिंग की विधि-पूर्वक पूजा करते हैं जिसमें पूजा के दौरान बेल-पत्र चढ़ाते हैं। इसके साथ ही रात्रि जागरण आदि भी करते हैं।

इस पर्व को मनाने की विधियां एवं धारणाएं हमारे पिछले वर्ष के लेख में प्रकाशित हो चुका है आप चाहे तो निम्नलिखित Links पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं !

शिवरात्रि – 2017        शिवरात्रि – 2016

महाशिवरात्रि व्रत कथा –

वैसे तो कथाएं बहुत सी हैं लेकिन उनमें से एक हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं :

प्राचीन काल में, एक जंगल में गुरुद्रुह नाम का एक शिकारी रहता था जो जंगली जानवरों का शिकार करके अपने परिवार का भरण-पोषण किया करता था।  एक बार शिवरात्रि के दिन वह शिकार के लिए निकला लेकिन पूरा दिन व्यतीत हो जाने के उपरांत भी उसे कोई शिकार नहीं मिला।

इस बात से वह चिंतित हो गया कि आज उसके बच्चों, पत्नी एवं माता-पिता को भूखा रहना पड़ेगा। सूर्यास्त होने पर वह एक जलाशय के समीप गया और वहां एक घाट के किनारे से थोड़ा सा जल पीने के लिए लेकर पास के एक पेड़ पर चढ़ गया। उसे पूरी उम्मीद थी कि कोई न कोई जानवर अपनी प्यास बुझाने के लिए यहां जरूर आएगा। संयोगवश वह पेड़ बेल-पत्र का था और उसी पेड़ के नीचे शिवलिंग भी था जो सूखे बेलपत्रों से ढके होने के कारण दिखाई नहीं दे रहा था।

रात का पहला प्रहर बीतने से पूर्व एक हिरणी वहां पानी पीने के लिए आई। उस पर निशाना साधने के दौरान उसके हाथ के धक्के से कुछ पत्ते एवं जल की कुछ बूंदें नीचे बने शिवलिंग पर गिरीं और अनजाने में ही शिकारी की पहले प्रहर की पूजा हो गई। हिरणी ने जब पत्तों की खड़खड़ाहट सुनी, तो घबरा कर ऊपर की ओर देखा और भयभीत हो कर शिकारी से बोली- मुझे मत मारो। शिकारी ने कहा कि परिवार की भूख मिटाने की वजह से वह उसे नहीं छोड़ सकता।

हिरणी ने वादा किया कि वह अपने बच्चों को अपने स्वामी को सौंप कर लौट आएगी। शिकारी के शक करने पर उसने फिर से शिकारी को यह कहते हुए अपनी बात का भरोसा करवाया कि जैसे सत्य पर ही धरती टिकी है, समुद्र मर्यादा में रहता है और झरनों से जल-धाराएं गिरा करती हैं, वैसे ही वह भी सत्य बोल रही है। क्रूर होने के बावजूद शिकारी को उस पर दया आ गई और उसने उस हिरनी को जाने दिया।

थोड़ा समय व्यतीत होने के बाद एक और हिरनी वहां पानी पीने आई। इस बार भी शिकारी जैसे ही तीर साधने लगा, वैसे ही उसके हाथ के धक्के से फिर जल और कुछ बेलपत्र नीचे शिवलिंग पर जा गिरे। इस तरह शिकारी से दूसरे प्रहर की पूजा भी हो गई।

इस हिरनी ने भी भयभीत हो कर, शिकारी से जीवनदान की याचना की लेकिन उसके अस्वीकार कर देने पर ,हिरनी ने उसे लौट आने का वचन दिया। साथ ही कहा कि जो वचन दे कर पलट जाता है, उसका अपने जीवन में संचित पुण्य नष्ट हो जाया करता है। उस शिकारी ने पहले की तरह, इस हिरनी के वचन का भी भरोसा कर उसे जाने दिया।

इसके बाद कुछ देर बात एक और हिरण वहां आया। और अब फिर धनुष पर बाण चढ़ाने से पहले की तरह शिकारी से तीसरे प्रहर की पूजा भी संपन्न हो गई। हालांकि इस हिरण ने भी अपने बच्‍चों को उनकी माता को सौंपकर लौटने की बात कही। हिरण ने कहा – मैं धन्य हूं कि मेरा यह शरीर किसी के काम आएगा, परोपकार से मेरा जीवन सफल हो जाएगा। लेकिन कृपया कर अभी मुझे जाने दो ताकि मैं अपने बच्चों को उनकी माता के हाथ में सौंप कर और उन सबको धीरज बंधा कर यहां लौट आऊं। हिरण ने श‍िकारी को वचन द‍िया – यदि वह लौटकर न आए तो उसे वह पाप लगे जो उसे लगा करता है जो सामर्थ्य रहते हुए भी दूसरे का उपकार नहीं करता।

इसी दौरान रात्रि का अंतिम प्रहर शुरू हो गया और तभी श‍िकरी ने देखा क‍ि सभी अपने परिवार सहित आ रहे हैं। उन्हें देखते ही उसने अपने धनुष पर बाण रखा और पहले की ही तरह उसकी चौथे प्रहर की भी शिव-पूजा संपन्न हो गई | अब उस शिकारी के शिव कृपा से सभी पाप भस्म हो गये इसलिए वह सोचने लगा- ये पशु धन्य हैं जो ज्ञानहीन हो कर भी अपने शरीर से परोपकार करना चाहते हैं लेकिन धिक्कार है मेरे जीवन पर जो मैं अनेक प्रकार के कुकृत्यों से अपने परिवार का पालन करता रहा।

अब उसने अपना बाण रोक लिया तथा मृगों से कहा क‍ि वे सब वापस जा सकते हैं। उसके ऐसा करने पर भगवान् शंकर ने प्रसन्न हो कर तत्काल उसे अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन करवाया और उसे सुख-समृद्धि का वरदान देकर गुह नाम प्रदान किया। रामायण काल में इसी गुह के साथ भगवान श्री राम ने मित्रता की थी।


RECOMMENDATIONS


1. कोई भी भक्ति हो उसमें मन का ही प्रभाव अधिक होता है इसलिए भक्ति में इंद्रियां कार्यरत हो या ना हो लेकिन मन शिवमय अर्थात  शिव में ही लीन होना चाहिए !

2. शिवजी को प्रसन्न करने के लिए किसी विशेष मंत्र की आवश्यकता नहीं, आप सिर्फ सच्चे मन से उनके नाम का स्मरण करें अथवा ‘ओम नमः शिवाय’ का स्मरण करते रहें ! 

3. अगर आपको उनका पूजन विधान नहीं ज्ञात हो तो कोई चिंता नहीं करें, आप सिर्फ उनके गुण लीला धाम का ही स्मरण करें क्योंकि वह सहज ही भोले हैं इसीलिए उनका नाम भोलेनाथ है वह थोड़े में ही प्रसन्न हो जाते हैं !

4. इस दिन आप राम कथा का भी श्रवण स्मरण कर सकते हैं क्योंकि शिव जी को श्री हरि सर्वाधिक प्रिय हैं !

5. पूज्य वास्तविक गुरु, परमहंस या संत का तो भूलकर भी अपमान नहीं करें अन्यथा शिव जी क्रोधित हो सकते हैं इसका प्रमाण ‘रामायण’ में काक भुशुंडी कथा में वर्णित है !

6. अपने आप को दीन और हीन समझकर जो उनकी शरणागत हो जाता है उसके लिए कोई विधान नहीं होता क्योंकि उसका सर्वस्य फिर प्रभु ही संभालते हैं जैसा की गीता के 18वें अध्याय के 66वें श्लोक में वर्णित है कि :

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ 

 7. परिणामस्वरुप उनकी कृपा सभी पर भिन्न हो सकती है क्योंकि भक्तों में उनकी भक्ति सकाम और निष्काम दोनों प्रकार की होती है !

                     शिव सत्य है, शिव अनंत है,
                  शिव अनादि है, शिव भगवंत है,
                  शिव ओंकार है, शिव ब्रह्म है,
                   शिव शक्ति है, शिव भक्ति है,
                आओ भगवान शिव का नमन करें,
                 उनकी कृपा हम सब पर बनी रहे !

                YouTube : महाशिवरात्रि आराधना

महाशिवरात्रि की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं !

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