24 Teachings of Lord ‘Dattatreya’

जीवन में गुरु की अपनी एक विशेष जगह है ! सच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए आपको किसी न किसी को गुरु बनाना पड़ता है चाहे फिर वो एकलव्य की तरह मिट्टी की मूरत ही क्यों ना हों। गुरु की इसी महता को प्रमाणित करते है भगवान दत्तात्रेय, जो की स्वयं भगवान विष्णु के अवतार थे फिर भी उन्होंने अपने जीवन में 24 गुरु बनाए जिसमे कीट, पक्षी और जानवर तक शामिल है। उन्होंने जिससे भी कुछ सीखा उसे अपना गुरु माना।

संक्षिप्त परिचय – भगवान दत्तात्रेय 

भगवान दत्तात्रेय ब्रह्माजी के मानस पुत्र ऋषि अत्रि के पुत्र हैं। इनकी माता का नाम अनुसूइया है ! इनके तीन पुत्र हुए। ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा, शिवजी के अंश से दुर्वासा ऋषि, भगवान विष्णु के अंश दत्तात्रेय का जन्म हुआ। भगवान दत्तात्रेय ब्रह्मा, विष्णु और शिव के सम्मिलित अवतार भी हैं।

एक समय राजा यदु जी को जब दत्तात्रेय जी के दर्शन हुए तो दत्तात्रेय जी का दर्शन पाकर राजा यदु ने अपने को धन्य माना और विनयावनत होकर पूछा – 

आपके शरीर, वाणी और मस्तक में प्रचंड तेज विद्यमान है ! इस सिद्धावस्था को पहुँचाने वाला ज्ञान आपको जिन सदगुरु द्वारा मिला हो उनका परिचय मुझे देने का अनुग्रह कीजिये !

परम तेजस्वी अवधूत जी ने कहा –

राजन! सदगुरु किसी व्यक्ति विशेष को नहीं मनुष्य के गुणग्राही दृष्टिकोण को कहते हैं ! विचारशील लोग सामान्य वस्तुओं और घटनाओं से भी शिक्षा लेते और अपने जीवन में धारण करते हैं ! अतएव उनका विवेक बढ़ता जाता है ! यह विवेक ही सिद्धियों का मूल कारण है !

अविवेकी लोग तो ब्रह्मा के समान गुरु को पाकर भी कुछ लाभ उठा नहीं पाते ! इस संसार में दूसरा कोई किसी का हित साधन नहीं करता, उद्धार तो अपनी आत्मा के प्रयत्न से ही हो सकता है !

मेरे अनेक गुरु हैं , जिनसे भी मैंने ज्ञान और विवेक ग्रहण किया है उन सभी को मै अपना गुरु मानता हूं पर उनमे 24 गुरु प्रधान हैं और उनसे जो शिक्षा मिली उसे मैं आपको बताता हूं !

24 Teachings Of Shri Dattatreya Ji

1. पृथ्वी- पृथ्वी से हम सहनशीलता व परोपकार की भावना सीख सकते हैं। पृथ्वी पर लोग कई प्रकार के आघात करते हैं, कई प्रकार के उत्पात होते हैं, कई प्रकार खनन कार्य होते हैं, लेकिन पृथ्वी हर आघात को परोपकार का भावना से सहन करती है। 

2. वायु- अचल (निष्क्रिय) होकर ना बैठना, गतिशील रहना ,संतप्तों को सांत्वना देना, गंध को वहन तो करना पर स्वयं निर्लिप्त रहना ! जिस प्रकार अच्छी या बुरी जगह पर जाने के बाद वायु का मूल रूप स्वच्छता ही है। उसी तरह अच्छे या बुरे लोगों के साथ रहने पर भी हमें अपनी अच्छाइयों को छोडऩा नहीं चाहिए। ये विशेषताएं मैंने पवन में पाई और उन्हें सीख कर उसे गुरु माना !

3. आकाश- अनंत और विशाल होते हुए भी अनेक ब्रह्मांडों को अपनी गोदी में भरे रहने वाले ,ऐश्वर्यवान होते हुए भी रंच भर अभिमान ना करने वाले आकाश को भी मैंने गुरु माना है!

4. जल- सब को शुद्ध बनाना ,सदा सरल और तरल रहना, पवित्रता तथा आतप को शीतलता में परिणित करना ,वृक्ष ,वनस्पतियों तक को जीवन दान करना ,समुद्र का पुत्र होते हुए भी घर घर आत्मदान के लिए जा पहुंचना -इतनी अनुकरणीय महानताओ के कारण जल को मैंने गुरु माना !

5.अग्नि- निरंतर प्रकाशवान रहने वाली , अपनी उष्मा को आजीवन बनाये रखने वाली , दवाव पड़ने पर भी अपनी लपटें उर्ध्वमुख ही रखने वाली , बहुत प्राप्त करके भी संग्रह से दूर रहने वाली, स्पर्श करने वाले को अपने रूप जैसा ही बना लेने वाली, समीप रहने वालों को भी प्रभावित करने वाली अग्नि मुझे आदर्श लगी. कैसे भी हालात हों, हमें उन हालातों में ढल जाना चाहिए। जिस प्रकार आग अलग-अलग लकडिय़ों के बीच रहने के बाद भी एक जैसी ही नजर आती है। 

6. सूर्य – नियत समय पर अपना नियत कार्य अविचल भाव से निरंतर करते रहना, स्वयं प्रकाशित होना और दूसरों को भी प्रकाशित करना, नियमितता, निरंतरता, प्रखरता और तेजस्विता के गुणों ने ही सूर्य को मेरा गुरु बनाया !

7.चन्द्रमा- अपने पास प्रकाश ना होने पर भी सूर्य से याचना कर पृथ्वी को चांदनी का दान देते रहने वाला परमार्थी चन्द्रमा मुझे सराहनीय लोक-सेवक लगा ! आत्मा, लाभ-हानि से परे है। वैसे ही जैसे घटने-बढऩे से भी चंद्रमा की चमक और शीतलता बदलती नहीं है, हमेशा एक-जैसे रहती है। आत्मा भी किसी भी प्रकार के लाभ-हानि से बदलती नहीं है। विपत्ति में सारी कलाएं क्षीण हो जाने पर भी निराश होकर ना बैठना और फिर आगे बढ़ने के साहस को बार -बार करते रहना. धैर्यवान चंद्रमा का श्रेष्ठ गुण कितना उपयोगी है, यह देख कर मैंने उसे अपना गुरु बनाया !

8. समुद्र- नदियों द्वारा निरंतर असीम जल की प्राप्ति होते रहने पर भी, अपनी मर्यादा से आगे ना बढ़ने वाला, रत्न राशि के भंडारों का अधिपति होने पर भी नहीं इतराने वाला, जीवन के उतार-चढ़ाव में भी खुश और गतिशील रहना तथा स्वयं खारी होने पर भी बादलों को मधुर जल दान करते रहने वाला समुद्र भी मेरा गुरु है !

9. मछली- हमें स्वाद का लोभी नहीं होना चाहिए। मछली किसी कांटे में फंसे मांस के टुकड़े को खाने के लिए चली जाती है और अंत में प्राण गंवा देती है। हमें स्वाद को इतना अधिक महत्व नहीं देना चाहिए, ऐसा ही भोजन करें जो सेहत के लिए अच्छा हो।

10. कबूतर- कबूतर का जोड़ा जाल में फंसे बच्चों को देखकर खुद भी जाल में जा फंसता है। इनसे यह सबक लिया जा सकता है कि किसी से बहुत ज्यादा स्नेह दु:ख की वजह होता है।

11. हिरण- हिरण उछल-कूद, संगीत, मौज-मस्ती में इतना खो जाता है कि उसे अपने आसपास शेर या अन्य किसी हिसंक जानवर के होने का आभास ही नहीं होता है और वह मारा जाता है। इससे यह सीखा जा सकता है कि हमें कभी भी मौज-मस्ती में इतना लापरवाह नहीं होना चाहिए।

12. मकड़ी- मकड़ी से दत्तात्रेय जी ने सीखा कि भगवान भी माया जाल रचते हैं और उसे मिटा देते हैं। जिस प्रकार मकड़ी स्वयं जाल बनाती है, उसमें विचरण करती है और अंत में पूरे जाल को खुद ही निगल लेती है, ठीक इसी प्रकार भगवान भी माया से सृष्टि की रचना करते हैं और अंत में उसे समेट लेते हैं।


13. भृंगी कीड़ा- इस कीड़े से दत्तात्रेय ने सीखा कि अच्छी हो या बुरी, जहां जैसी सोच में मन लगाएंगे मन वैसा ही हो जाता है।

14. भौंरा – भौरें से दत्तात्रेय ने सीखा कि जहां भी सार्थक बात सीखने को मिले उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। जिस प्रकार भौरें अलग-अलग फूलों से पराग ले लेता है।

15. सर्प- दत्तात्रेय ने सांप से सीखा कि किसी भी संयासी को अकेले ही जीवन व्यतीत करना चाहिए। साथ ही, कभी भी एक स्थान पर रुककर नहीं रहना चाहिए। जगह-जगह ज्ञान बांटते रहना चाहिए।

16.अजगर- अजगर से सीखा कि हमें जीवन में संतोषी बनना चाहिए। जो मिल जाए, उसे ही खुशी-खुशी स्वीकार कर लेना चाहिए।

17. कीट पतंगा- जिस प्रकार पतंगा आग की ओर आकर्षित होकर जल जाता है। उसी प्रकार रूप-रंग के आकर्षण और झूठे मोह में उलझना नहीं चाहिए।

18. मधुमक्खी – मधुमक्खियां शहद इकट्ठा करती है और एक दिन छत्ते से शहद निकालने वाला सारा शहद ले जाता है। इस बात से ये  सीखा जा सकता है कि आवश्यकता से अधिक चीजों को एकत्र करके नहीं रखना चाहिए तथा मनुष्य को स्वार्थी नहीं परमार्थी होना चाहिये !

19. कुरर पक्षी- कुरर पक्षी से सीखना चाहिए कि चीजों को पास में रखने की सोच छोड़ देना चाहिए। कुरर पक्षी मांस के टुकड़े को चोंच में दबाए रहता है, लेकिन उसे खाता है। जब दूसरे बलवान पक्षी उस मांस के टुकड़े को देखते हैं तो वे कुरर से उसे छिन लेते हैं। 

20. बच्चे- छोटे बच्चे से सीखा कि हमेशा चिंतामुक्त और प्रसन्न रहना चाहिए। राग ,द्वेष ,चिंता ,काम ,लोभ ,क्रोध से रहित जीव कितना कोमल ,सोम्य और सुन्दर लगता है कितना सुखी और शांत रहता है !

21. शरकृत (तीर बनाने वाला) –  अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में करना चाहिए। दत्तात्रेय ने एक तीर बनाने वाला देखा जो तीर बनाने में इतना मग्न था कि उसके पास से राजा की सवारी निकल गई, पर उसका ध्यान भंग नहीं हुआ।

 22. कौआ- किसी पर विश्वास ना करके और धूर्तता की नीति अपना कर कौवा घाटे में ही रहा, उसे सब का तिरस्कार मिला और अभक्ष खा कर संतोष करना पड़ा ! यह देख कर मेने जाना की धूर्तता और स्वार्थ की नीति अंतत हानिकारक ही होती है ! यह सीखाने वाला कौवा भी मेरा गुरु ही है !

23. स्त्री – एक महिला चूडियाँ पहने धान कूट रही थी, उसकी चूड़ियाँ आपस में टकराने से खनकती थीं ! वो चाहती  थी की घर आये मेहमान को इसका पता ना चले इसलिए उसने हाथों की बाकी चूड़ियाँ उतार दीं और केवल एक एक ही रहने दी तो उनका आवाज करना भी बंद हो गया ! यह देख मेने सोचा की अनेक कामनाओ के रहते मन में संघर्ष उठते हैं ,पर यदि एक ही लक्ष्य नियत कर लिया जाए तो सभी उद्वेग शांत हो जाएँ ….जिस स्त्री से ये प्रेरणा मिली वो भी मेरी गुरु ही तो है !

24.यम- वृद्धि पर नियंत्रण करके संतुलन स्थिर रखना, अनुपयोगी को हटा देना, मोह के बन्धनों से छुड़ाना और थके हुओं को अपनी गोद में विराम देने के आवश्यक कार्य में संलग्न यम भी मेरे गुरु हैं ! 

FEW MORE TEACHINGS :

25. हाथी – कामातुर हाथी मायावी हथनियों द्वारा प्रपंच में फँसा कर बंधन में बाँध दिया गया और फिर आजीवन त्रास भोगता रहा ! यह देख कर मैंने वासना के दुष्परिणाम को समझा और उस विवेकी प्राणी को भी अपना गुरु माना !

26.लुहार – लुहार अपनी भट्टी में लोहे के टूटे फूटे टुकड़े गरम कर के हथोड़े की चोट से कई तरह के औजार बना रहा था ! उसे देख समझ आया की निरुपयोगी और कठोर प्रतीत होने वाला इन्सान भी यदि अपने को तपने और चोट सहने की तैयारी कर ले तो उपयोगी बन सकता है ! 

27.भ्रंग कीड़ा- भ्रंग कीड़ा एक झींगुर को पकड़ लाया और अपनी भुनभुनाहट से प्रभावित कर उसे अपने जैसा बना लिया ! यह देख कर मेने सोचा एकाग्रता और तन्मयता के द्वारा मनुष्य अपना शारीरिक और मानसिक कायाकल्प कर डालने में भी सफल हो सकता है ! इस प्रकार भ्रंग भी मेरा गुरु बना !

28. पिंगला वेश्या – पिंगला वेश्या जब तक युवा रही तब तक उसके अनेक ग्राहक रहे ! लेकिन वृद्ध होते ही वे सब साथ छोड़  गए ! रोग और गरीबी ने उसे घेर लिया ! लोक में निंदा और परलोक में दुर्गति देखकर मैने सोचा की समय चूक जाने पर पछताना ही बाकी रह जाता है, सो समय रहते ही वे सत्कर्म कर लेने चाहिये जिससे पीछे पश्चाताप न करना पड़े ! अपने पश्चाताप से दूसरों को सावधानी का सन्देश देने वाली पिंगला भी मेरे गुरु पद पर शोभित हुई !

उपर्युक्त प्रमुख 24 गुरुओ का वृत्तान्त सुना कर दत्तात्रय ने राजा से कहा – गुरु बनाने का उद्देश्य जीवन के प्रगति पथ पर अग्रसर करने वाला प्रकाश प्राप्त करना ही तो है ! और यह कार्य अपनी विवेक बुद्धि के बिना संभव नहीं है ! इसलिए सर्वप्रथम गुरु है –विवेक ! उसके बाद ही अन्य सब ज्ञान पाने के आधार बनते हैं ! 

आप अपने चारों ओर उपस्थित किसी भी चीज से सीख ले सकते हैं बस सीखने के लिए आपकी दृष्टि चाहिए ! निर्भर करता है कि आपकी दृष्टि उस वस्तु को किस तरीके से देखती है !!

ज्ञान और वैराग्य प्राप्त होने के बाद भी जहां प्रेम नहीं है वहां सब व्यर्थ ही है ! परमात्मा को प्राप्त करना है तो बस प्रेम करना सीखिए !! परमात्मा को सिर्फ प्रेम से ही पाया जा सकता है फिर उनको पाने के बाद कुछ शेष नहीं रह जाता और फिर उनसे मिलता है दिव्य प्रेम ! कभी ख़त्म ना होने वाला, असीमित ! जहां दुख का नामोनिशान तक नहीं तभी आपका जीवन सफल होगा और यही मनुष्य जीवन का एकमात्र लक्ष्य है !!!
             ••• Jai Shri Dattatreya •••

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