Soordas – A Great Amorist of Lord Krishna

                  •    श्री गणेशाय नम :  •

Soordas : a great sightless devotee of Shri Krishna

Here we’ll explore the life of this great saint. Although, you might have heard everything about him but yet we’ll memorize you his life, struggle and life turning moments i.e. how did he achieve the grace of the Lord?

Note : For better pronouncing, we will use ‘Soordas’ instead of ‘Surdas’.

Short Intro & Early Life Of Soordas-

 सूरदास भक्ति के दोनो निरूपण मे से सगुण धारा के कवि कहे जाते हैं . ये श्री कृष्ण के परम भक्त हैं इसलिए इनकी रचना में कृष्ण भक्ति के भाव उजागर होते हैं. सूरदास जन्म से ही नेत्रहीन थे, लेकिन उनकी रचनाओं में कृष्ण लीलाओं का जो वर्णन मिलता हैं वो किसी नेत्र वाले व्यक्ति के लिए भी आसान नहीं होगा . रचनाओं में इतना मार्मिक विस्तार किया कि जैसे इन्होने स्वयं कान्हा के बालपन का अनुभव लिया हो . 

सूरदास पंद्रहवी सदी के संत, कवि कहे जाते हैं इनकी रचनायें कृष्ण भक्ति से ओत प्रोत हैं इनके नाम के समान ही यह सूर के दास हैं जिनके जीवन में संगीत का सूर एवम कृष्ण की भक्ति ही सब कुछ हैं !


There is some disagreement regarding the exact birth date of Soordas, most scholars believing it to be 1479 AD. It is the same in the case of the year of his death and most considered year is 1581 AD. According to the limited authentic life history of Soordas, it is said that he was born in the village Sihi of Faridabad (Haryana), although some say it was Runkta near Agra. He was born in a Sarswat Brahman family. His father’s name was Pandit Ramdas Sarswat who also was a singer.




सूरदास जी का जन्म एक अत्यन्त निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके तीन बड़े भाई थे। सूरदास जन्म से ही अन्धे थे किन्तु सगुन बताने की उनमें अद्भुत शक्ति थी। 6 वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने अपनी सगुन (बिना आंखो के भी वस्तुओं का निरूपण कर पाना) बताने की विद्या से माता-पिता को चकित कर दिया था, किन्तु इसी के बाद वे घर छोड़कर चार कोस दूर एक गाँव में तालाब के किनारे रहने लगे थे। सगुन बताने की विद्या के कारण शीघ्र ही उनकी ख्याति हो गयी। गानविद्या में भी वे प्रारम्भ से ही प्रवीण थे। शीघ्र ही उनके अनेक सेवक हो गये और वे ‘स्वामी’ के रूप में पूजे जाने लगे। 18 वर्ष की अवस्था में उन्हें पुन: विरक्ति हो गयी। और वे यह स्थान छोड़कर आगरा और मथुरा के बीच यमुना के किनारे गऊघाट पर आकर रहने लगे।


A chance meeting with the saint Vallabharacharya (spiritual teacher of Soordas) at Gau Ghat by the river Yamuna in his teens transformed his life. He taught Soordas lessons in Hindu philosophy and meditation and put him on the path of spirituality. Since Soordas could recite the entire Srimad Bhagavatam and was musically inclined, his guru advised him to sing the ‘Bhagavad Lila’ – devotional lyrical ballads in praise of Lord Krishna and Radha.



The Poetical works of Soordas – 

The philosophy of Soordas’ work is a reflection of the times.  He was very much immersed in the Bhakti movement that was sweeping India.  This movement represented a grass roots spiritual empowerment of the masses.  Soordas in particular was a proponent of the Shuddhadvaita school of Vaishnavism (also known as Pushti Marg).  This is no doubt due to the training he received under his spiritual Guru Sri Vallabhacharya.  This philosophy is based upon the spiritual metaphor of the Radha-Krishna Lila (The celestial dance between Radha and Lord Krishna).  This is derived from earlier saints such as the great Kabir Das.


सूरदास जी द्वारा लिखित पाँच ग्रन्थ बताए जाते हैं –

 सूरसागर, सूरसारावली, साहित्यलहरी, नलदमयन्ती , ब्याहलो।

उपरोक्त में अन्तिम दो अप्राप्य हैं। नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पुस्तकों की विवरण तालिका में सूरदास के १६ ग्रन्थों का उल्लेख है। इनमें सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी, नल-दमयन्ती, ब्याहलो के अतिरिक्त दशमस्कंध टीका, नागलीला, भागवत्, गोवर्धन लीला, सूरपचीसी, सूरसागर सार, प्राणप्यारी, आदि ग्रन्थ सम्मिलित हैं। इनमें प्रारम्भ के तीन ग्रंथ ही महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं, साहित्य लहरी की प्राप्त प्रति में बहुत प्रक्षिप्तांश जुड़े हुए हैं।

 सूरदास अकबर के समय से प्रसिद्ध हैं वे निजकृत भजन गाते थे जिसके जरिये वे भक्तों को कृष्ण के जीवन का ज्ञान देते हैं . इनकी पकड़ ब्रज भाषा में कही जाती हैं . कहते हैं बादशाह अकबर और महाराणा प्रताप दोनों ही सूरदास से बहुत अधिक प्रभावित थे .


सूरदास जी ने अपने पदों के द्वारा यह संदेश दिया हैं कि भक्ति सभी बातों से श्रेष्ठ हैं . उनके पदों में वात्सल्य, श्रृंगार एवम शांत रस के भाव मिलते हैं . सूरदास जी कूट नीति के क्षेत्र में भी काव्य रचना करते हैं . उनके पदों में कृष्ण के बाल काल का ऐसा वर्णन हैं मानों उन्होंने यह सब स्वयं देखा हो . यह अपनी रचनाओं में सजीवता को बिखेरते हैं . इनकी रचनाओं में प्रकृति का भी वर्णन हैं जो मन को भाव विभोर कर देता हैं . सूरदास जी भावनाओं के घनी हैं इसलिए उनकी रचनायें भावनात्कम दृष्टि कोण से अत्यंत लुभावनी हैं .


ATTAINING SUPREME BLISS (END OF THE PHYSICAL BODY INTO FIVE ELEMENTS) 

पारसौली वह स्थान है, जहाँ पर कहा जाता है कि कृष्ण ने रासलीला की थी। इस समय सूरदास को आचार्य वल्लभ, श्रीनाथ जी और गोसाई विट्ठलनाथ ने श्रीनाथ जी की आरती करते समय सूरदास को अनुपस्थित पाकर जान लिया कि सूरदास का अन्त समय निकट आ गया है। उन्होंने अपने सेवकों से कहा कि, “पुष्टिमार्ग का जहाज” जा रहा है, जिसे जो लेना हो ले ले। आरती के उपरान्त गोसाई जी रामदास, कुम्भनदास, गोविंदस्वामी और चतुर्भुजदास के साथ सूरदास के निकट पहुँचे और सूरदास को, जो अचेत पड़े हुए थे, चैतन्य होते हुए देखा। सूरदास ने गोसाई जी का साक्षात् भगवान के रूप में अभिनन्दन किया और उनकी भक्तवत्सलता की प्रशंसा की। चतुर्भुजदास ने इस समय शंका की कि सूरदास ने भगवद्यश तो बहुत गाया, परन्तु आचार्य वल्लभ का यशगान क्यों नहीं किया। सूरदास ने बताया कि उनके निकट आचार्य जी और भगवान में कोई अन्तर नहीं है-जो भगवद्यश है, वही आचार्य जी का भी यश है। गुरु के प्रति अपना भाव उन्होंने “भरोसो दृढ़ इन चरनन केरो” वाला पद गाकर प्रकट किया। इसी पद में सूरदास ने अपने को “द्विविध आन्धरो” (चित्त और नेत्र व्रत्ती) भी बताया और फ़िर निश्चित समय पर अपने प्रभु का स्मरण करते हुए शरीर त्याग दिया ! 


A LYRICS BY SOORDAS (THE DEEDS OF KRISHNA) –

There is no end to the deeds of Krishna: true to his promise, he tended the cows in Gokula.

Lord of the gods and compassionate to his devotees, he came as Nrisingha and tore apart Hiranyakashipa.

When Bali spread his dominion over the three worlds, he begged three paces of land from him to uphold the majesty of the gods, and stepped over his entire domain: here too he rescued the captive elephant.

Countless such deeds figure in the Vedas and the Puranas, hearing which Soordas humbly bows before that Lord.

Few Supreme Excerpts Of Soordas’s Compositions – 


Here we will describe some act of Krishna written by Soordas in short. Read them and have sank in the well of divine love of the Lord.


1. Raag Ramkali  (My only mind that gone to you, Krishna) –


उधो, मन न भए दस बीस।
एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस॥
सिथिल भईं सबहीं माधौ बिनु जथा देह बिनु सीस।
स्वासा अटकिरही आसा लगि, जीवहिं कोटि बरीस॥
तुम तौ सखा स्यामसुन्दर के, सकल जोग के ईस।
सूरदास, रसिकन की बतियां पुरवौ मन जगदीस॥ 



2. Raag Todi (Soordas wanted to See Krishna) –

अंखियां हरि-दरसन की प्यासी।
देख्यौ चाहति कमलनैन कौ¸ निसि-दिन रहति उदासी।
आए ऊधै फिरि गए आंगन¸ डारि गए गर फांसी।
केसरि तिलक मोतिन की माला¸ वृन्दावन के बासी।।
काहू के मन को कोउ न जानत¸ लोगन के मन हांसी।
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौ¸ करवत लैहौं कासी।।


3. Raag Ramkali (Krishna’s Makhan Lila) –


मैं नहीं माखन खायो मैया | मैं नहीं माखन खायो | ख्याल परै ये सखा सबै मिली मेरैं मुख लपटायो || देखि तुही छींके पर भजन ऊँचे धरी लटकायो | हौं जु कहत नान्हें कर अपने मैं कैसे करि पायो || मुख दधि पोंछी बुध्दि एक किन्हीं दोना पीठी दुरायो | डारी सांटी मुसुकाइ जशोदा स्यामहिं कंठ लगायो || बाल बिनोद मोद मन मोह्यो भक्ति प्राप दिखायो | सूरदास जसुमति को यह सुख सिव बिरंचि नहिं पायो ||”

अर्थ :-  श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में माखन चोरी की लीला सुप्रसिध्द है | वैसे तो कान्हा ग्वालिनों के घरो में जाकर माखन चुराकर खाया करते थे | लेकिन आज उन्होंने अपने ही घर में माखन चोरी की और यशोदा मैया ने उन्हें देख लिया | सूरदासजी ने श्रीकृष्ण के वाक्चातुर्य का जिस प्रकार वर्णन किया है वैसा अन्यत्र नहीं मिलता | यशोदा मैया ने देखा की कान्हा ने माखन खाया हैं तो उन्होंने कान्हा से पूछा की क्योरे कान्हा ! तूने माखन खाया है क्या ? तब बालकृष्ण ने अपना पक्ष किस तरह मैया के सामने प्रस्तुत करते हैं, यही इस दोहे की विशेषता हैं | कन्हैया बोले …मैया ! मैंने माखन नहीं खाया हैं | मुझे तो ऐसा लगता हैं की ग्वाल – बालों ने ही बलात मेरे मुख पर माखन लगा दिया है | फिर बोले की मैया तू ही सोच, तूने यह छींका किना ऊंचा लटका रखा हैं मेरे हाथ भी नहीं पहुच सकते हैं | कन्हैया ने मुख से लिपटा माखन पोंछा और एक दोना जिसमें माखन बचा था उसे छिपा लिया | कन्हैया की इस चतुराई को देखकर यशोदा मन ही मन में मुस्कुराने लगी और कन्हैया को गले से लगा लिया | सूरदासजी कहते हैं यशोदा मैया को जिस सुख की प्राप्ति हुई वह सुख शिव व ब्रम्हा को भी दुर्लभ हैं | भगवान् श्रीकृष्ण की बाल लिलाओं के माध्यम से यह सिध्द किया हैं की भक्ति का प्रभाव कितना महत्वपूर्ण हैं |

4. Raag Gauri –  

जो तुम सुनहु जसोदा गोरी | नंदनंदन मेरे मंदीर में आजू करन गए चोरी || हों भइ जाइ अचानक ठाढ़ी कह्यो भवन में कोरी | रहे छपाइ सकुचि रंचक ह्वै भई सहज मति भोरी || मोहि भयो माखन पछितावो रीती देखि कमोरी | जब गहि बांह कुलाहल किनी तब गहि चरन निहोरी || लागे लें नैन जल भरि भरि तब मैं कानि न तोरी | सूरदास प्रभु देत दिनहिं दिन ऐसियै लरिक सलोरी ||”

अर्थ :- सूरदास जी का यह पद राग गौरी पर आधारित हैं | भगवान् की बाल लीला का रोचक वर्णन हैं | एक ग्वालिन यशोदा के पास कन्हैया की शिकायत लेकर आयी | वो बोली की हे नंदभामिनी यशोदा ! सुनो तो, नंदनंदन कन्हैया आज मेरे घर में चोरी करने गए | पीछे से मैं भी अपने भवन के निकट ही छुपकर खड़ी हो गई | मैंने अपने शरीर को सिकोड़ लिया और भोलेपन से उन्हें देखति रही | जब मैंने देखा की माखन भरी वह मटकी बिल्कुल ही खाली हो गई हैं तो मुझे बहोत पछतावा हुआ | जब मैंने आगे बढ़कर कन्हैया की बांह पकड़ ली और शोर मचाने लगी, तब कन्हैया मेरे चरणों को पकड़कर मेरी मनुहार करने लगे |इतना ही नहीं उनके नयनोँ में अश्रु भी भर आए |ऐसे में मुझे दया आ गई और मैंने उन्हें छोड़ दिया | सूरदास कहते हैं की इस प्रकार नित्य ही विभिन्न लीलाएं कर कन्हैया ने ग्वालिनों को सुख पहुँचाया |


In the same manner, you can read the full text buy purchasing his books from Gita press, Gorakhpur. You can also download the ebook from the net. There are a lot of such texts available not only written by soordas, also some another poet like Tulsidas, Mirabaai. We are presenting few poems written by Soordas (translated into english) :

1. Krishna Questions His Hair Braid Not Growing –

 Mother, when will my hair-braid grow?Milk you said will make it grow, but still it remains so short. 

Mother when will my hair-braid grow?You said like Bal it would be strong, his braid has grown fat and long, combing , braiding, bathing, drying, to the ground like a serpent writhing. 

For me you say milk is better. Never delicious bread and butter, Sur, long live the two brothers, The twosome of hari and haldhar.


2. Krishna approches Radha- 

Krishna said, O fair beauty ! Who are you? Where do you live? Whose daughter are you? I never yet saw you in the lanes of Braj. 

Radha said, ‘What need have I to come this way? I keep playing by my door. But I hear that son of Nanda is in the habit of stealing butter and curds. 

Krishna said, ‘Look, why should I appropriate anything that’s yours? Come, let’s play together. Soordas says: By his honied words, Krishna, the crafty prince of amorists, beguiled Radha and pur her at ease.

3. Secret Signs of Krishna to Radha –

Krishna conveyed by signs to clever Radha.  To make a pretence of milking the cows, and picking up the milkpail come to meet him in the meadow. 

Nanda, his foster-father, would also be there to have the cows counted and verified, and he would bring him along too, so they would have a chance to meet. 

Radha’s heart rejoiced at their mutual resolve. But that lovely golden-hued girl, feeling abashed, hid her face in her arms. Krishna amorously lifting it up gazed at her lovingly. 

They kept their hidden love to themselves. Says Soordas as Krishna went on speaking sweet nothings, Radha blushed with shame.

SOOR SAGAR : Most Famous Text of Soordas –


सूरसागर  कीर्तनों-पदों का एक सुंदर संकलन है जो शब्दार्थ की दृष्टि से आदरणीय है। इसमें भक्ति की प्रधानता के साथ दो प्रसंग “कृष्ण की बाल-लीला’ और “भ्रमर-गीतसार’ अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। वर्तमान मे इस ग्रंथ के 5000 पद ही प्राप्त हैं ! इस द्वादश स्कंधात्मक सूरसागर की “रूपरेखा” निम्नवत है – 
प्रथम स्कंध – भक्ति की सरस व्याख्या, भागवत निर्माण का प्रयोजन, शुक उत्पत्ति, व्यास अवतार, संक्षिप्त महाभारत कथा, सूत-शौनक-संवाद, भीष्म प्रतिज्ञा, भीष्म-देह-त्याग, कृष्ण-द्वारिका-गमन, युधिष्ठिर वैराग्य, पांडवों का हिमालयगमन, परीक्षितजन्म, ऋषिशाप, कलियुग को दंड इत्यादि।

• द्वितीय स्कंध – सृष्टि उत्पत्ति, विराट् पुरुष का वर्णन, चौबीस अवतारों की कथा, ब्रह्मा उत्पत्ति, भागवत चार श्लोक महिमा। साथ ही इस स्कंध के प्रारंभ में भक्ति और सत्संग की महिमा, भक्ति साधन, अत्मज्ञान, भगवान की विराट् रूप में भारती का भी यत्विंचित् उल्लेख है।

• तृतीय स्कंध – उद्धव-विदुर-संवाद, विदुर को मैत्रेय द्वारा बताए गए ज्ञान की प्राप्ति, सप्तर्षि और चार मनुष्यों की उत्पत्ति, देवासुर जन्म, बाराह-अवतार-वर्णन, कर्दम-देवहूति-विवाह, कपिल मुनि अवतार, देवहूति का कपिल मुनि से भक्ति संबंधी प्रश्न, भक्तिमहिमा, देवहूति-हरि-पद-प्राप्ति।

• चतुर्थ स्कंध – यज्ञपुरुष अवतार, पार्वती विवाह, ध्रुव कथा, पृथु अवतार, पुरंजन आख्यान।

• पंचम स्कंध – ऋषभदेव अवतार, जड़भरत कथा, रहूगण संवाद।

• षष्ठ स्कंध – अजामिल उद्धार, बृहस्पति-अवतार-कथन, वृत्रा-सुरवध, इंद्र का सिंहासन से च्युत होना, गुरुमहिमा, गुरुकृपा से इंद्र को पुन: सिंहासन प्राप्ति।

• सप्तम स्कंध – नुसिंह-अवतार-वर्णन।

• अष्टम स्कंध – गजेंद्रमोक्ष, कूर्मावतार, समुद्र मंथन, विष्णु भगवान का मोहिनी-रूप-धारण, वामन तथा मत्स्य अवतारों का वर्णन।

• नवम स्कंध – पुरुरवा-उर्वशी-आख्यान, च्यवन ऋषि कथा, हलधर विवाह, राजा अंबरीय और सौभिर ऋषि का उपाख्यान, गंगा आगमन, परशुराम और श्री राम का अवतार, अहल्योद्धार।

• दशम स्कंध (पूर्वार्ध): भगवान कृष्ण का जन्म, मथुरा से गोकुल पधारना, पूतनावध, शकटासुर तथा तृणावर्त वध, नामकरण, अन्नप्राशन, कर्णछेदन, घुटुरुन चलाना, बालवेशशोभा, चंद्रप्रस्ताव, कलेऊ, मृत्तिकाभक्षण, माखनचोर, गोदोहन, वंत्सासुर, बकासुर, अधासुरों के वध, ब्रह्मा द्वारा गो-वत्स-हरण, राधा-प्रथम-मिलन, राधा-नंदघर-आगमन, कृष्ण का राधा के घर जाना, गोचारण, धेनुकवध, कालियदमन, प्रलंबासुरवध, मुरली-चीर-हरण, पनघट रोकना, गोवर्धन पूजा, दानलीला, नेत्र वर्णन, रासलीला, राधा-कृष्ण-विवाह, मान, राधा गुरुमान, हिंडोला-लीला, वृषभासुर, केशी, भौमासुर वध, अकूर आगमन, कृष्ण का मथुरा चला जाना, कुब्जा मिलन, धोबी संहार, शल, तोषल, मुष्टिक और चाणूर का वध, धनुषभंग, कुवलयापीड़ (हाथी) वध, कंसवध, राजा उग्रसेन को राजगद्दी पर बैठाना, वसुदेव देवकी की कारागार से मुक्ति, यज्ञोपवीत, कुब्जाघर गमन, आदि-आदि।

•दशम स्कंध (उत्तरार्ध) – जरासंध युद्ध, द्वारका निर्माण, कालियदवन दहन, मुचुकुंद उद्धार, द्वारका प्रवेश, रुक्मिणी विवाह, प्रद्युम्न विवाह, अनिरुद्ध विवाह, राजा मृग नृग उद्धार, बलराम जी का पुन: ब्रजगमन, सांब विवाह, कृष्ण-हस्तिनापुर-गमन, जरासंध और शिशुपाल का वध, शाल्व का द्वारका पर आक्रमण, शाल्ववध, दतवक्र का वध, बल्वलवध, सुदामाचरित्र, कुरुक्षेत्र आगमन, कृष्ण का श्रीनंद, यशोदा तथा गोपियों से मिलना, वेद और नारद स्तुतियाँ, अर्जुन-सुभद्रा-विवाह, भस्मासुर वध, भृगु परीक्षा, इत्यादि. . .।

• एकादश स्कंध – श्रीकृष्ण का उद्धव को वदरिकाश्रम भेजना, नारायण तथा हंसावतार कथन।

• द्वादश स्कंध – बौद्धावतार, कल्कि-अवतार-कथन, राजा परीक्षित तथा जन्मेजय कथा, भगवत् अवतारों का वर्णन आदि।


SOORDAS ATTAINS DEVOTION –


Soordas attains the devotion of Lord Krishna. In one incident, Soordas falls into a well and is rescued by Lord Krishna when he calls him for help. Radha asks Krishna why he helped Soordas? Krishna replied, His devotion is what makes him getting my grace. Krishna also warns Radha not to go near him. She however goes near him.  Soordas recognized the divine sounds and pulls her anklets. Radha tells him who she is but Soordas refuses to return her anklets stating that he cannot believe her as he is blind. Then Krishna gives Soordas vision and allows him to ask for a boon. Soordas returns the anklets and said that he has already got what he wanted (the blessings of Krishna) and asks Krishna to make him blind again as he does not want to see anything else in the world after seeing Krishna. Radha is moved by his devotion and Krishna grants his wish by making him blind again thus giving him everlasting fame and devotion.

सूरदास और उनकी भक्ति – 

सूरदास की भक्ति में अंतःकरण की प्रेरणा तथा अंतर की अनुभूति की प्रधानता है। उनके काव्य में अभिव्यक्त भक्ति-भावना के दो चरण देखे जा सकते हैं – पहला चरण वल्लभाचार्य से मिलने के पूर्व का है जिसमें सूरदास वल्लभ संप्रदाय में दीक्षित होने से पूर्व दैन्यभाव पर आधारित भक्ति के पदों की रचना कर रहे थे जबकि दूसरा चरण वल्लभाचार्य से मिलने के बाद आरंभ होता है. सूरदास वल्लभ संप्रदाय में दीक्षित होकर पुष्टिमार्गीय भक्ति पर आधारित भक्ति के पदों की रचना की ओर प्रवृत हुए !

सूरदास ने अपनी भक्ति में ईश्वर के समक्ष अनेक प्रकार की विनय भावना व्यक्त की है। सूरदास ने स्वयं को अपने ईश्वर का तुच्छ सेवक मानते हुए उनके समक्ष दैन्य प्रकट किया है। इस कारण सूरदास की भक्ति ‘दास्य भाव’ की भक्ति कहलाती है जिसमें भक्त स्वयं को अपने ईश्वर का दास मानकर उनकी सेवा और भक्ति करता है। इस संदर्भ में एक कहावत प्रचलित है कि सूरदास जब गऊघाट पर रहते थे तो उन्हें वहां एक दिन वल्लभाचार्य के आने का पता चला। सूरदास उचित समय पर वल्लभाचार्य से मिलने गए और उनके आदेश पर अपने रचित दो पद उन्हें गाकर भी सुनाए –

‘हौं हरि सब पतितन कौ नायक’ एवं

‘प्रभु! हौं सब पतितन कौ टीकौ।’

वल्लभाचार्य सूरदास के इन दीनतापूर्ण पदों को सुना तो उन्होंने सूरदास से कहा कि –

‘जो सूर ह्वै कै ऐसो घिघियात काहे को है? कुछ भगवत् लीला वर्णन करौ।’

इस पर सूरदास ने वल्लभाचार्य से कहा कि प्रभु! मुझे तो भगवान की लीलाओं का किंचित भी ज्ञान नहीं। ऐसा सुनकर वल्लभाचार्य ने सूरदास को अपने संप्रदाय में स्वीकारते हुए पुष्टि मार्ग में दीक्षित करने का निश्चय किया। उन्होंने सूरदास को श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध की बनाई हुई अपनी अनुक्रमणिका सुनाई जिसके पश्चात् सूरदास ने विनय के पदों का गान छोड़कर पुष्टिमार्गी परिपाटी के अनुसार ईश्वर की भक्ति का वर्णन करना आरंभ कर दिया।

भक्ति भावना के प्रथम चरण में सूरदास ‘ईश्वर-भक्ति’ को इस संसार में व्याप्त भय एवं ताप से बाहर निकलने का एक मात्र रास्ता मानते हैं। उनका अनुराग ईश्वर के प्रति अप्रतिम है इसलिए सांसारिकता के प्रति उन्होंने विराग भाव व्यक्त किया है। सांसारिक सुखों की निंदा करते हुए सूरदास ने सभी सांसारिक कार्यों, सुखों और अवस्थाओं को दोषपूर्ण माना है। उनका मानना था कि निष्पक्ष आंखों से देखने पर ही अपने भीतर की अच्छाईयां और बुराईयां दिखाई पड़ती हैं और खुद के प्रति बरती गयी यही ईमानदारी भक्त के ह्रदय में दैन्य भाव को जगाती है। इसी कारण सूरदास के विनय वर्णित इन आरंभिक पदों में दैन्य भावों की प्रधानता है। ईश्वर के गुणों की अधिकता और उनके समक्ष अपनी लघुता का भाव उन्होंने सूरसागर के आरंभ में बार-बार प्रकट किया हैं। वे कहते हैं कि अगर उन्होंने ईश्वर-भक्ति नहीं की तो उनका इस संसार में जन्म लेना ही व्यर्थ है –

“सूरदास भगवंत भजन बिनु धरनी जननी बोझ कत मारी” …सूरदास प्रभु तुम्हरे भजन बिनु जैसे सूकर स्वान-सियार”

सूरदास का भक्त ह्रदय इतिहास और पुराण के अनेक उद्धरणों के माध्यम से भक्तों पर ईश्वरी कृपा के महत्त्व का प्रतिपादन करता है। अहिल्या, गणिका, अजामिल, गज, द्रौपदी, प्रहलाद आदि उदाहरणों के माध्यम से सूरदास यह स्थापित करते हैं कि कैसे ईश्वर अपने भक्तों पर कृपा की बौछार बरसाते हैं। सूरदास का भक्त ह्रदय ऐसा स्मरण कर स्वयं को संतुष्ट करता है –

“गज गनिका गौतम तिय तारी। सूरदास सठ सरन तुम्हारी।”

सूरदास का मानना था कि ईश्वर अपने भक्तों पर असीम कृपा करते हैं। इसलिए उन्होंने ईश्वर को भक्ति वत्सल और हितकारी कहा है –

“ऐसे कान्ह भक्त हितकारी, प्रभु तेरो वचन भरोसौ सांचौ।”

अपनी दुर्दशा के वर्णन द्वारा सूरदास प्रभु शरण में जाने की इच्छा बार-बार व्यक्त करते हैं – “अबकि राखि लेहु भगवाना”

सूरदास के इस चरण की भक्ति पर संत कवियों की वाणी का भी प्रभाव दिखाई पड़ता है। इस दौर में माया से संबंधित अनेक पदों की रचना करते हुए उन्होंने माया की भर्त्सना ठीक संत कवियों जैसी ही की है। यद्यपि आगे चलकर उन्होंने निर्गुण भक्ति पर गहरा प्रहार भी किया लेकिन उनकी भक्ति भावना के निरूपण के इस आरंभिक चरण में उन पर संत कवियों का प्रभाव पड़ा। कुल मिलाकर ‘संसार से विराग और ईश्वर से राग’ यही सूरदास की आरंभिक दौर की भक्ति का मूल आधार रहा है जिसे उन्होंने बड़ी तल्लीनता के साथ व्यक्त किया है।


 सूरदास द्वारा निरूपित भक्ति का दूसरा चरण पुष्टिमार्गीय भक्ति से जुड़ता है। ‘पुष्टि’ का अर्थ है – ‘भगवान का अनुग्रह।’ श्रीमद्भागवत के द्वितीय स्कंध के दशम अध्याय में पुष्टि को परिभाषित करते हुए कहा गया है – ‘पोषणं तदनुग्रह’ अर्थात ईश्वर का अनुग्रह (कृपा) ही पोषण है। देवताओं द्वारा पोषण या पुष्टिवर्धन की यह मान्यता वैदिक कालीन है। ईश्वर के अनुग्रह यानी पोषण के बिना जीव को मुक्ति नहीं मिल सकती है। ईश्वर के पोषण (अनुग्रह) को अधिक महत्व देने के कारण ही इस मत को पुष्टिमार्ग कहा जाता है। 

वल्लभाचार्य पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक हैं। ईश्वर अनुग्रह पूर्वक जीव को अपने सामान ही आनंदमय बना देते हैं। इस आनंदमय स्थिति की प्राप्ति ही मुक्ति है। मुक्ति की प्राप्ति के लिए भक्ति ही एकमात्र साधन है। आचार्य हरिराम मुक्तावली में पुष्टिमार्ग की सटीक परिभाषा देते हुए लिखते हैं – “समस्त विषय त्यागः सर्वभावेन यात्रा हि। समर्पण च दोहेदे: पुष्टिमार्ग स कथयते।” अर्थात्, ‘जहां समस्त विषयों का सब प्रकार से त्याग हो, देहादि का पूर्ण समर्पण हो, वह पुष्टिमार्ग कहलाता है।’  तो इस प्रकार सूरदास कृष्ण के परमभक्त बन गये और उन्हे ईश्वर की भक्ति मिल गयी !!

NOTE –  कुछ लोग सूरदास के अंधे होने पर भ्रम या शक जाहिर करते हैं लेकिन ऐसा उन्हे नही करना चाहिये. एक सच्चे भक्त का किसी के गुणदोष पर नज़र नही डालनी चाहिये. उसे तो उसके भावों पर मोहित होना चाहिये, उसके द्वारा किये गये कार्यों पर उस रस का आनंद लेना चाहिये जिसमे वह पहले से ही अनुरक्त है ! प्रभु तो उससे बहुत प्रसन्न रहते हैं जो सच्चे मन से दीन और हीन होते हैं नाकि उन पर जो दीन और हीन होने का प्रपंच रचते हैं ! सूरदास जैसे भी थे खुश थे क्योंकि : 

सीताराम सीताराम सीताराम कहिये ! 

जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये !!

So we are ending our post here. Do the devotion of God with pure heart. Don’t show off. Showing off is good for others, not for God. Your cleverness may work for this material world but not in the case of spirituality i.e. Divine world. 

 हे राधे कृष्ण… तेरी नजरो का भी कोई जबाव नही है, तू मिल जाए अगर तो इससे बडी बात नही है,, बरसाता रहता है तू कृपा हम सबपर प्यारे,,,फिर कैसे कह दूं की तेरी कृपा साथ नही है !!!!

Thank you ! Jai Shri Krishna !!

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