A Short Flash on ‘Sagun- Nirgun’ Brahm

                         श्री गणेशाय नम:

We are here to give you a short flash on the two forms of Supreme Lord i.e. with Form & Formless. We do not have the enough potential to know the Lord exactly but we’ll explain it in the most possible easiest way. Note that for your better pronouncing the word ‘Saguna & Nirguna’, we will use ‘Sagun & Nirgun’. Lets begin…

WITH FORM & WITHOUT FORM : 

The Absolute which came from the Sanskrit ‘saguna'(सगुण) which means with qualities and gunas (devine properties). In other word, something which has some shapes (आकृति) is called as Sagun. Its viceversa, that has no qualities, no gunas, no shapes referred as Nirgun (निर्गुण). 

Hence the supreme power existed in both the two ways are called as Sagun Brahm and Nirgun Brahm. These two forms had some other names. E.g. 

सगुण : साकार, सविशेष, व्यक्त, विग्रह …

निर्गुण : निर्विकार, निर्विशेष, अव्यक्त, अद्रष्ट…

जब से यह सृष्टि बनी है और उस के पश्चात जब जीव उत्पन्न हुआ उसके मन में हमेशा ही यह प्रश्न गूँजते रहे की मैं कौन हूँ? यह प्रकृति क्या है और उसको बनाने वाला पुरूष कौन है। अर्थात् उन ज्ञानी पुरूषों के हृदय में जिन्होंने कि सम्पूर्णता को प्राप्त नहीं किया है, और जो सम्पूर्णता की तरफ अग्रसर है। उनके हृदय में हमेशा ही जीव, प्रकृति एवं पुरुष के प्रति जिज्ञासाएँ उत्पन्न होती रहती है ! विशेषतः जो व्यक्ति, जीव का अर्थ इंसान को लेते है, वे गलत है। सही मायने में जीव का अर्थ आत्मा है। इस आत्मा को ही पँचतत्वों में बँधे होने के कारण शास्त्रों में जीव कहा गया है. आज के वक्त में जो हम मत्स्य, कच्छप, वराह, अश्व, वानर आदि को ईश्वरावतार मानते है। इसके पीछे कारण है कि महाप्रलय से लेकर और उसके उपरान्त एक-एक करके उस परमात्मा ने जिन जीवों को इस धरा पर उतारा और उन जीवों ने मानव को धरा पर रहने में मदद की। इसलिऐ हिन्दू-धर्म में इन सभी की पूजा की जाती है। 

सृष्टि की उत्पत्ति के उपरान्त जब मानव का जन्म हुआ। तो प्रश्न वहीं का वहीं था। इस को समझने के लिए इन्सान भटकता रहा। अन्त में उसे ज्ञान की प्राप्ति हुई, और पूर्णता को प्राप्त हुआ, जिस के द्वारा उस का जन्म हुआ था। साधक के मन में हमेशा ही अनेकों प्रश्न उठते रहते है। जैसे की वह परमात्मा सगुण है, या निर्गुण। सगुण और निर्गुण में वह परमात्मा सगुण भी है और निर्गुण भी है…लेकिन कैसे?

Imp. * – सगुण का अर्थ है कि जिसमें सभी सुंदर गुणों का समावेश हो, उस परमात्मा के अन्दर सभी गुण मौजूद है। निर्गुण का अर्थ- जिस में कोई बुरे गुण न हो। चूँकि यह सम्पूर्ण सृष्टि एवं 84 लाख जीव उस परमात्मा ने बनाये हैं। इससे हमें पता चलता है, कि वह परमात्मा सर्वगुण संपन्न अर्थात् सगुण है। इस के उपरान्त साकार का अर्थ है कि- उस का अपना एक रंग रूप होना और निराकार का अर्थ है जिस का कि कोई रंग रूप न हो।

इस प्रकार हम ध्यान-पूर्वक देखें तो हमे पता चलता है, कि वह परमात्मा निराकार है। क्योंकि उसका अपना कोई भी रंग और रूप नहीं है। वह केवल ज्ञानियों के हृदय में ज्योति स्वरूप होकर भासता है। इस तरह ध्यान-पूर्वक मनन करने पर हमे पता चलता है कि वह परमात्मा निराकार है। अनेकों शास्त्रों में अनेकों जगह स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है कि- जो साधक जिस देव विशेष की पूजा करेगा, वह मृत्यु उपरान्त उसी लोक या मंडल में प्रवेश पाने का अधिकारी है।

* अवतार शरीर प्रभु का नित्य-विग्रह है । वह न मायिक है और न भौतिक । उसमें स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीरों का भेद भी नहीं होता । जैसे दीपक की ज्योति में विशुद्ध अग्नि है, दीपक की बत्ती की मोटाई केवल उस अग्नि के आकार का तटस्थ उपादान कारण है, ऐसे ही भगवान का श्री विग्रह शुद्ध सचिदानंदघन हैं । भक्त का भाव, भाव स्तर से उद्भूत है और भाव-स्तर नित्य धाम से । भगवान का नित्य-विग्रह कर्मजन्य नहीं है वह स्वेच्छामय है, इसी प्रकार भगवानवतार कर्म भी आसक्ति की कामना या वासना के अवतार प्रेरित नहीं है, दिव्य लीला के रुप है । भगवान के अवतार के समय उनके शरीर का बाल्य-कौमारादि रूपों में परिवर्तन दिखता है, वह रूपों के आविर्भाव तथा तिरोभाव के कारण ।

जिस परमात्मा की वेदों में कविरूप में प्रशंसा की गई है अथवा जिसे क्रान्तदर्शी कहा गया है, विद्वान् लोग जिसके सम्बन्ध में यह कहते हैं कि वह परमात्मा दो रूपोंवाला है-सगुण और निर्गुण-दयालु आदि गुणों के कारण वह सगुण है और निराकार, अकाय आदि गुणों के कारण निर्गुण है-ऐसे परमेश्वर को मनुष्यों में विद्वान् लोग अपने जीवन में धारण करते हैं-प्रकट करते हैं। 

Explanation through SCRIPTURES :

तुलसीदास जी ने भी उस निर्गुण ब्रह्म का निरूपण कुछ इस प्रकार किया :

• बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥

आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥

वह (ब्रह्म) बिना ही पैर के चलता है, बिना ही कान के सुनता है, बिना ही हाथ के नाना प्रकार के काम करता है, बिना मुँह (जिह्वा) के ही सारे (छहों) रसों का आनंद लेता है और बिना वाणी के बहुत योग्य वक्ता है।

• तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा॥

असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी॥

वह बिना शरीर (त्वचा) के ही स्पर्श करता है, आँखों के बिना ही देखता है और बिना नाक के सब गंधों को ग्रहण करता है (सूँघता है)। उस ब्रह्म की करनी सभी प्रकार से ऐसी अलौकिक है कि जिसकी महिमा कही नहीं जा सकती।

– जबकि सगुण इसके विपरीत है गुण तो हैं लेकिन दुर्गुण से भरा नहीं है , सगुण युक्त है. वैसे भी प्रभु का एक बहुत प्यारा नियम है : 

• जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी। 

देखहि रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरै सरीरा। 

डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी। 

रहे असुर छल  छोनिप  बेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा।

– You can get the lord with love. He is present everywhere and he knows very well whats running in your mind. So be careful. 

• ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप। 

भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप।

He is doing every possible good things to you all without showing his presentness. Actually our eyes can’t see him without his grace. But yet he used to take an incarnation to the needies.Thats what we called as Sagun. We can see this form of the lord. 

बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। 

निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गोपार।

NO DIFFERENCE IN BOTH THE TWO FORMS : 

भक्तों के कल्याण के लिये वो सगुण हो जाते हैं. इन दोनों स्वरूपों मे कोई भेद नही है.

• सगुनहि अगुनहि नहि कछु भेदा। गावहि मुनि पुरान बुध बेदा। 

अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई।

सगुण और निर्गुण में कुछ भी भेद नहीं है – मुनि, पुराण, पंडित और वेद सभी ऐसा कहते हैं। जो निर्गुण, अरूप (निराकार), अलख (अव्यक्त) और अजन्मा है, वही भक्तों के प्रेमवश सगुण हो जाता है।
• जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें॥

जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा। तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा॥

जो निर्गुण है वही सगुण कैसे है? जैसे जल और ओले में भेद नहीं। (दोनों जल ही हैं, ऐसे ही निर्गुण और सगुण एक ही हैं।) जिसका नाम भ्रमरूपी अंधकार के मिटाने के लिए सूर्य है, उसके लिए मोह का प्रसंग भी कैसे कहा जा सकता है? लेकिन लोगों ने पता नही क्या क्या भ्रम फैला रखा है, क्या करें वो लोग तो बेचारे उनकी माया के वशीभूत हैं !

जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका॥

हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं। तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं॥

जिनको निर्गुण-सगुण का कुछ भी विवेक नहीं है, जो अनेक मनगढ़ंत बातें बका करते हैं, जो हरि की माया के वश में होकर जगत में (जन्म-मृत्यु के चक्र में) भ्रमते फिरते हैं, उनके लिए कुछ भी कह डालना असंभव नहीं है।

* गीता मे भी अर्जुन ने ऐसा ही प्रश्न किया की इन दोनो स्वरूपों मे कौन उत्तम है ? 

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।

ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ 

भावार्थ : अर्जुन ने पूछा – हे भगवन! जो विधि आपने बतायी है उसी विधि के अनुसार अनन्य भक्ति से आपकी शरण होकर आपके सगुण-साकार रूप की निरन्तर पूजा-आराधना करते हैं, अन्य जो आपकी शरण न होकर अपने भरोसे आपके निर्गुण-निराकार रूप की पूजा-आराधना करते हैं, इन दोनों प्रकार के योगीयों में किसे अधिक पूर्ण सिद्ध योगी माना जाय?

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।

श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ 

भावार्थ : श्री भगवान ने कहा – हे अर्जुन! जो मनुष्य मुझमें अपने मन को स्थिर करके निरंतर मेरे सगुण-साकार रूप की पूजा में लगे रहते हैं, और अत्यन्त श्रद्धापूर्वक मेरे दिव्य स्वरूप की आराधना करते हैं वह मेरे द्वारा योगियों में अधिक पूर्ण सिद्ध योगी माने जाते हैं। 
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।

सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्‌ ॥ 

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।

ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ 
भावार्थ : लेकिन जो मनुष्य मन-बुद्धि के चिन्तन से परे परमात्मा के अविनाशी, सर्वव्यापी, अकल्पनीय, निराकार, अचल स्थित स्वरूप की उपासना करते हैं, वह मनुष्य भी अपनी सभी इन्द्रियों को वश में करके, सभी परिस्थितियों में समान भाव से और सभी प्राणीयों के हित में लगे रहकर मुझे ही प्राप्त होते हैं।

Imp.- प्रभु कहते हैं की उत्तम कोई भी नही है दोनो ही मार्गों से भक्त प्राप्त कर लेते हैं. जिसे जो भी स्वरूप प्यारा लगे या उसके मन को भाये, उसी का निरंतर ध्यान करे ! 

(इसके बाद के श्लोकों मे प्रभु ने अपने प्रिय भक्तों के लक्षण बतलाये हैं, लेकिन उसे प्रकाशित करना इस पोस्ट का लक्ष्य नही है ! )

सृष्टि पूर्व हरि देखत, सोचत मृदु मुसकात ।

सगुण रूप साकार नित, वेद विदित विख्‍यात ।।

भावार्थ- कुछ भोले अद्वैती कहते हैं कि ब्रह्म निर्गुण निर्विशेष निराकार ही है। सृष्टि के पश्चात् कुछ लोगों ने सगुण साकार की कल्‍पना की है। किंतु सृष्टि के पूर्व ही भगवान् ने देखा, सोचा तथा मुस्कुराये। अतः  सृष्टि के पूर्व ही वे सदा साकार रहे हैं। जो अद्वैती ऐसा कहते हैं कि सृष्टि के पश्चात् पंडितों ने ब्रह्म को सगुण साकार निरूपित किया है वो बतायें कि सृष्टि हुई कैसे? वेद स्‍वयं कह रहे हैं…

 ‘सो ऽकामयत्’। (तैत्तिरीयो. 2-6)

‘स ईक्षत’। (ऐतरेयो. 1-1-1, 1- 3-11)

‘तदैक्षत’। (छान्‍दो. 6-2-3)

‘स ईक्षांचक्रे’ (प्रश्‍नो. 6-3)

‘वीक्षितमस्‍य पंच भूतानि’ (वेद)

‘स्मितमेतस्‍य चराचरम्’ आदि। (वेद)

* अर्थात् सृष्टि के पूर्व भगवान् ने संकल्‍प किया। देखे ! मुसकराये ! यह सब कार्य सगुण साकार भगवान् ही कर सकते हैं। निर्गुण ब्रह्म, बिना मन के कैसे सोचेगा? बिना आँख के कैसे देखेगा? बिना मुख कैसे मुस्कुरायेगा? जिस वेद वाणी से अद्वैती लोग ज्ञान प्राप्‍त करते हैं, वह भी साकार विग्रह के श्वास से ही प्रकट हुआ।

‘निःश्‍ वसितमस्‍य वेदाः’। (वेद)

केनोपनिषत् में यक्ष कथा मे भी लिखा है कि –

ईश्‍वरेच्‍छया तृणमपि बज्रीभवति।

सा नित्‍यमेव सर्वज्ञेश्‍ वरेण सह सर्तते। (शांकर भाष्‍य)

इसलिये बहकावे मे ना आये, दोनो ही स्वरूप अपने अपने स्थान पर सही हैं और जिस किसी भी स्वरूप से आप भक्ति कर सकते हैं तो करें …अगर तब भी ना हो तो गीता का ‘कर्म योग’ अपनायें !

SUMMARY : 

So, Don’t be afraid. Whatever the forms you like, worship that but with a strict restriction that your mind should be dedicated to the Lord only. For more clearance refer to our scriptures.

√ The “Preponderance of expressions” is MUST. 
All the scriptures are saying the same thing but in different- different manner. You can get the lord by ‘LOVE’. Don’t get attached to the material world so much. Just enjoy his creation but do not assume it a permanant reality.

Thank You ! Good things from the above post are the blessing of the Lord, and the bad portion is our down-ness. 

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